तमनार का ‘काला अध्याय’: जहाँ मर्यादा हारी, वहां विकास कैसा?

रायगढ़: छत्तीसगढ़ की न्यायधानी और ऊर्जा की धरा कहे जाने वाले रायगढ़ का तमनार क्षेत्र आज एक ऐसी हृदयविदारक घटना का गवाह बना, जिसने लोकतांत्रिक विरोध और मानवीय संवेदनाओं के बीच की मर्यादा को पूरी तरह खत्म कर दिया है। कोल ब्लॉक के विरोध में उपजा जन-आक्रोश जब हिंसा में बदला, तो उसने न केवल संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया, बल्कि हमारी उस सनातनी परंपरा पर भी गहरा प्रहार किया जहाँ नारी को पूजनीय माना जाता है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक महिला पुलिसकर्मी के साथ अमानवीय व्यवहार के वीडियो ने प्रशासनिक खामियों के साथ-साथ समाज के गिरते नैतिक स्तर पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वह महिला पुलिसकर्मी, जो कर्तव्य पथ पर तैनात थी, वह किसी की बेटी और बहन भी है। उसकी सुरक्षा करना तंत्र और समाज दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी थी, लेकिन भीड़ की हिंसक मानसिकता के आगे सिस्टम बेबस नजर आया। यह देखना अत्यंत पीड़ादायक रहा कि साथी कर्मी भी उसे उस भयावह स्थिति से समय रहते बाहर निकालने में असफल रहे।
भारतीय संस्कृति और इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस भी कालखंड में स्त्री की गरिमा के साथ खिलवाड़ हुआ, उस साम्राज्य का अंत निश्चित रहा। कुरु सभा में द्रौपदी के चीरहरण की परिणति महाभारत के भीषण विनाश के रूप में हुई थी। तमनार की इस घटना ने आंदोलन की पवित्रता पर एक ‘काला धब्बा’ लगा दिया है। अपनी जमीन की लड़ाई लड़ना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन विरोध की आड़ में किसी स्त्री की अस्मिता को चोट पहुँचाना कायरता की पराकाष्ठा है।
तमनार के इतिहास में यह दिन एक ‘काले दिन’ के रूप में दर्ज किया जाएगा। जन-आक्रोश जब विवेक खो देता है, तो वह सबसे पहले अपनी संस्कृति और मर्यादा की बलि देता है। ग्रामीणों का गुस्सा जायज हो सकता है, लेकिन उस गुस्से की दिशा जब एक निर्दोष महिला की ओर मुड़ गई, तो उस संघर्ष ने अपना नैतिक आधार खो दिया।
प्रशासनिक जांच अपनी जगह है, लेकिन यह घटना पूरे समाज के लिए आत्मचिंतन का विषय है। क्या हम अधिकारों की मांग करते-करते इतने अंधे हो गए हैं कि माताओं-बहनों का सम्मान ही भूल गए? यदि समाज के रक्षक ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हम किस सुरक्षित भविष्य और न्याय की कल्पना कर रहे हैं। तमनार की यह घटना एक कड़ा सबक है कि मर्यादा के बिना किया गया कोई भी संघर्ष अंततः विध्वंस की ओर ही ले जाता है।



